पत्रकारिता की रीढ़ की हड्डी है आंचलिक पत्रकारिता

30 मई हिंदी पत्रकारिता दिवस पर विशेष

पत्रकारिता की रीढ़ की हड्डी है आंचलिक पत्रकारिता

मनोज कुमार/ कल्पना कीजिए कि आपके शरीर में रीढ़ की हड्डी ना हो तो आपका जीवन कैसा होगा? क्या आप सहज जी पाएंगे? शायद जवाब ना में होगा। वैसे ही पत्रकारिता की रीढ़ की हड्डी आंचलिक पत्रकारिता है। आप चार पेज का अखबार प्रकाशित करें या 24 घंटे का न्यूज चैनल चलाएं, बिना आंचलिक पत्रकारिता, आप इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। समाचार संकलन से लेकर प्रसार तक में आंचलिक पत्रकारिता की भूमिका अहम होती है। दिल्ली की पत्रकारिता देहात से होकर ही जाती है। दिल्ली से आशय यहां पर महानगरों की पत्रकारिता से है। महानगरों की पत्रकारिता का जो ओज और तेज आपको दिखता है, वह आंचलिक पत्रकारिता की वजह से है।

पीने की पानी की समस्या से लेकर खंदक की लड़ाई आंचलिक पत्रकारिता लड़ती है और इस लड़ने और जूझने की खबर महानगरों की पत्रकारिता के लिए खुराक का काम करती है। हरसूद की कहानी बहुत पुरानी नहीं हुई है। इस पूरी लड़ाई को आंचलिक पत्रकारिता ने लड़ा लेकिन महानगरों की पत्रकारिता ने जब इसे अपनी हेडलाइन में शामिल किया तो वे हीरो बन गए। आंचलिक पत्रकारिता का दुख और दुर्भाग्य यह है कि वह बार बार और हर बार बुनियाद की तरह नीचे दबा रह जाता है और महानगर की पत्रकारिता कलश की तरह खुद को स्थापित कर लेता है। हरसूद ही क्यों, भोपाल की भीषण गैस त्रासदी को किसी बड़े अखबार ने नहीं बल्कि तब के एक अनाम सा साप्ताहिक अखबार ने उठाया था। आज उस विभीषिका से वास्ता पड़ा लेकिन महानगर की पत्रकारिता छा गई। इस घटना में उस साप्ताहिक की भूमिका को इसलिए दरकिनार नहीं किया जा सका क्योंकि उसके सम्पादक आज के रसूखदार पत्रकार राजकुमार केशवानी हैं। यही अखबार डिंडौरी, सिलवानी, बडऩगर, इछावर, कोतमा या ऐसी किसी जगह से प्रकाशित होता तो शायद आज उसका कोई नामलेवा भी नहीं होता।
आंचलिक पत्रकारिता की अपनी गमक है। इस बात को हम लोग अक्सर भूल जाते हैं और महानगर की पत्रकारिता की ओर टकटकी लगाए देखते हैं। कुपोषण को लेकर महानगर के पत्रकार सेसईपुरा, डिंडौरी और मंडला के गांवों में आते हैं और हमारे स्थानीय पत्रकारों की मदद से रिपोर्ट तैयार करते हैं लेकिन उनका नाम कहीं नहीं आता है। देश और विदेश के सारे बड़े नाम और सम्मान महानगर के पत्रकारों के खाते में चला जाता है और हमारा साथी इस बात को लेकर संतोष कर लेता है कि चलो, हमारी समस्या तो सरकार की नजर में आयी। गांवों में स्टोरी करना महानगर के पत्रकारों के लिए एक फैशन की तरह है। स्थानीय पत्रकारों की मदद से स्टोरी तैयार करते हैं और जब उसका प्रकाशन-प्रसारण बड़े बैनर पर होता है तो स्थानीय पत्रकार लापता होते हैं। किसी भी अखबार की हेडलाइन या किसी चैनल की ब्रेकिंग खबर गांव से निकलकर ही आती है। वैष्विक बीमारी कोरोना को लेकर जो स्टोरी अखबार, चैनल और सोशल मीडिया पर चल रही है उसके केन्द्र में गांव, ग्रामीण ही हैं। मुसीबत उनके हिस्से में है और खबरों का पेट भी वही भर रहे हैं जो भूखे पेट कोसों पैदल चलकर घर पहुंचने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं।  

पत्रकारिता की रीढ़ भले ही आंचलिक पत्रकारिता हो लेकिन आंचलिक पत्रकारिता के साथी सबसे ज्यादा समस्याओं से जूझते हैं। यह बात भी तय है कि बुनियाद का यह भाग्य ही होता है कि वह सबका भार उठाये। उसके कंधे पर चढ़कर दूसरे कलश बन जाएं और इतरायें लेकिन आंचलिक पत्रकारिता बुनियाद बनना ही पसंद करता है। यही कारण है कि हिन्दी पत्रकारिता में आंचलिकता हमेशा से मील का पत्थर बना हुआ है। पत्रकारिता का प्रथम पाठ आंचलिक पत्रकारिता से ही आरंभ होता है। आंचलिक पत्रकारिता ने कभी अपना ओज नहीं खोया। बदलते समय में वह और भी सामयिक होता गया। आज देश के नामचीन पत्रकारों की फेहरिस्त ढूंढ़ेंगे तो आपको उनमें से ज्यादतर किसी अनजान या छोटे गांव-कस्बे के मिलेंगे। दुर्भाग्य यही है कि कोई अपनी पहचान नहीं बताना चाहता है। अपनी देशज बोली-बानी को भूलकर अंग्रेजियत का चोला पहन रखा है कि वह खुद में गुम हो गया है।

जब हम गांव की ओर लौटते हैं। आंचलिक पत्रकारिता की चर्चा करते हैं तो हम गर्व से भर उठते हैं। इस बदलती दुनिया में वे नहीं बदले हैं और ना उनका दर्द बदला है। सबकुछ यथावत है। कुछेक लोगों की बात छोड़ दें तो पत्रकारिता के लिए समर्पित साथियों के घरों में ना तो ठीक से रहने का इंतजाम है और ना ही उनके बच्चे उन बड़े स्कूलों में पढ़ पाते हैं जिनका सपना हर माता पिता का होता है। हर दीवाली पर हमारे इन साथियों के पास पैसा नहीं, आश्वासन होता है। अगली दीवाली पर टीवी आ जाएगी। इस बार इन्हीं कपड़ों से काम चला लो। हर दीवाली यही वादे। भीषण गर्मी में साथियों के तपते घरों में पंखा भी रूक रूक कर चलता है। कूलर की बात भी अगली गर्मी तक टाल दी जाती है। एयरकंडीशन तो सपने में भी नहीं है। घर पर जमाने पुरानी सायकल है। अपने काम को गति देने के लिए सेकंडहेंड स्कूटर तो खरीद लिया लेकिन सौ गज में कब धोखा दे जाए, यह ना तो स्कूटर जानता है और ना ही चलाने वाला। हमारे एक साथी शहर में आए। अच्छी सेलरी मिलने लगी तो दबे सपने बाहर आ गए। नई कार लेने की हिम्मत नहीं थी सो कार सेकंडहेंड ले ली। अब हर दो दिन बाद गैरेज में उनकी कार खड़ी रहती थी। दूसरी सुविधाओं को लेकर तर्क होता है कि इस बार जरूर ले आएंगे लेकिन आता कभी नहीं है। अपने परिवार को आश्वासन देने में हमारे साथी जितने आगे होते हैं, उसके आगे तो राजनेता भी मत्थे टेक लेते हैं। अक्सर खबरों को लेकर पटवारी और थानेदार या भी स्थानीय नेता के कोप का भाजन आंचलिक पत्रकार को बनना पड़ता है। गांव की सरहद में आज भी पटवारी और थानेदार से बड़ा कोई नहीं होता है। इनसे जूझते हुए हमारे साथी हिम्मत नहीं हारते हैं। खबरें जुटाते हैं और बेखौफ लिखते हैं। लोभ-लालच से दूर होने के कारण पटवारी और थानेदारी की आवाज भी भोथरी हो जाती है।  

आंचलिक पत्रकारिता के आय का मुख्य स्रोत है स्थानीय स्तर पर मिलने वाले विज्ञापनों से प्राप्त होने वाला कमीशन, वह भी तब जब विज्ञापनदाता पूरी राशि चुकता कर दे। एक और सोर्स है अखबारों के विक्रय से होने वाला कमीशन लेकिन इसके लिए भी पहले धनराशि जमा कराना होती है। टेलीविजन चैनल ऐसी जगहों पर स्ट्रिंगर बनाते हैं जिनसे बहुत ही मामूली मानदेय मिलता है। अधिकांश स्थानों पर तो खबरों के आधार पर मानदेय का भुगतान किया जाता है। ऐसा भी नहीं है कि आंचलिक पत्रकारिता का परिदृश्य नहीं बदला है। बदला है और बदल रहा है हमारी नई पीढ़ी के कारण। उन्हें लगता है कि महानगर सुविधाओं में डूबा रहे और हम अंधेरे में। यह सच है कि सुविधा का स्तर बढ़ा है तो आंचलिक पत्रकारिता का विश्वास भी कम होने लगा है। सुविधा पाने का अर्थ है समझौता और समझौते का अर्थ है विश्वास को खो देना। हालांकि बिगड़ती स्थिति के बाद भी आंचलिक पत्रकारिता का वजूद इसलिए बना रहेगा क्योंकि वह एक हद तक समझौता कर लेता है लेकिन कहीं न कहीं उसकी कलम आग उगल देती है। पत्रकारिता को प्रोफेशन बनाइए क्योंकि ऐसा नहीं करेंगे तो प्रतिबद्ध पत्रकार की श्रृंखला खत्म हो जाएगी। स्वाभाविक है तब पत्रकारिता के स्थान पर मीडिया प्रोफेशनल्स आएंगे और आंचलिक पत्रकारिता का गौरव कहीं ना कहीं लांछित होगा, जैसा कि हम राजनीति में देख रहे हैं। आंचलिक पत्रकारिता की पीड़ा, उसके दर्द और तकलीफ से मैं बाबस्ता हूं लेकिन जरूरी है कि देहात की आवाज दिल्ली तक पहुंचाने के लिए हम पंडित माखनलाल चतुर्वेदी के सपनों को अपनी आंखों में जगाए रखें। महात्मा की पत्रकारिता आंचलिक पत्रकारिता की रीढ़ की हड्डी है। कबीराना ही आंचलिक पत्रकारिता का स्वभाव है और उसकी पहचान भी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं शोध पत्रिका समागम के संपादक हैं)