सहकर्मी की मौत पर पत्रकार बिरादरी की चुप्पी

सहकर्मी की मौत पर पत्रकार बिरादरी की चुप्पी

ब्लॉग अभिमन्यु कुमार द्वारा / पटना की पत्रकार बिरादरी को खुद को मुर्दा घोषित कर देना चाहिए. उनकी चुप्पी यह दर्शाती है कि वो अपना जमीर बेच चुके हैं. उनके सहकर्मी की मौत संस्थान की प्रताड़ना की वजह से हो जाती है और उनके मुंह से एक शब्द तक नहीं निकलता. रोज हज़ारों शब्द लिखने वाले पत्रकारों के ‘प्रतिरोध के शब्द’ झड़ जाते हैं.

उनकी यह चुप्पी नई नहीं है. इससे पहले भी उनके बीच से दर्जनों पत्रकारों को एकाएक संस्थान से निकाल दिया गया और वो चुप रह जाते हैं. साथ देने की बात तो छोड़िए, निकाले जाने की घोषणा के बाद से ही ये उन पत्रकारों से दूरी बना लेते हैं, जिन्हें संस्थान को विदा कहना था.

दैनिक भास्कर, हिंदुस्तान, बिजनेस स्टैंडर्ड और अंग्रेजी के अख़बारों के दर्जनों पत्रकार इस कोरोना काल के दौरान निकाल दिए गए. देश-दुनिया की फिक्र में दिनभर में सोशल मीडिया पर दर्जनों पोस्ट करने वाले पत्रकारों का इस छंटनी के ख़िलाफ़ मैंने एक पोस्ट तक नहीं देखा. यह दुखद है.

पत्रकारों की अगुवाई करने का दावा करने वाले संघ और क्लब की ओर से एक भी बुलाहट नहीं हुई. विरोध करना है या समर्थन करना है, इस पर बात तक नहीं हुई.

दरअसल यह पत्रकारिता का पतन काल है. पत्रकार ने खुद को आज सबसे कमजोर प्राणी बना लिया है. खुद को कभी शक्तिशाली समझने वाले पत्रकार आज सत्ता और कंपनी के सामने घुटने टेक चुके हैं. 

ख़बर की बात तो कीजिए ही नहीं, खुद के हक़ की लड़ाई में भी वो हथियार डाल चुके हैं. सभी को सिर्फ अपने फायदे की चिंता है. लेकिन यह अपना-अपना कब तक चलेगा? अपना-अपना करने वालों का भी नंबर आएगा, ये तय है. तरुण सिसोदिया और राज रतन कमल की मौत के बाद आपका नंबर भी आएगा. कब तक क्रूर कंपनियों के कांटे भरे आंचल में छिपोगे?

जिन पत्रकारों को पत्रकारिता से इन दिनों अलग-थलग किया गया, मैं दावे से साथ कह सकता हूं कि वर्तमान कर्मी उन्हें फोन तक नहीं करते होंगे. उनका हाल-चाल तक नहीं लेते होंगे.

दैनिक भास्कर से निकाले गए ऐसे ही एक कर्मी से मैं मिला. वो मानसिक रूप से अवसादग्रस्त दिखे. परिवार की जिम्मेदारियों के आसमां के तले दबे और आर्थिक जमीन खो चुके वो पत्रकार खुद को पाताल लोक में जाता हुआ महसूस कर रहे थे. मैंने उन्हें आत्महत्या जैसे विचारों के करीब जाते देखा है. मेरे मन में कुछ अनहोनी की आशंका है.

आप सोचिए कि कल तक कार्यालय में सुख-दुख और टिफिन एक-दूसरे से बांटने वाले जब बात कर करना बंद कर दे और नज़रे फेर ले तो हिम्मत और टूट जाती है. 

मैं ज़िले और पटना के कई ऐसे पत्रकारों को जानता हूं कि जिन्होंने अपनी पूरी जवानी किसी कंपनी को दी है और उनके सिर पर नौकरी जाने का खतरा मंडरा रहा  है. सबसे ज़्यादा दुख उन सभी को देख कर तब होता है जब वो बताते हैं कि उनके बच्चे दसवीं-बारहवीं की परीक्षा पास कर चुके हैं और आगे की उनकी पढ़ाई पर अधिक पैसे ख़र्च करने होंगे.

कुछ दिन पहले मेरे आईआईएमसी के सीनियर सत्यव्रत मिश्रा ने अपने फेसबुक पोस्ट में बिजनेस स्टैंडर्ड के पटना संस्करण में हुई छंटनी का जिक्र किया था. उन्होंने उसमें बताया था कि जो लोग भी निकाले गए हैं उनमें से लगभग सभी जिम्मेदारियों के बोझ तले दबे हुए हैं. किसी की बेटी की शादी होनी है तो किसी की बेटी अभी पैदा ही हुई है.

ये कैसी नौकरी है? और नौकरियां देने वाली कंपनियां इतनी क्रूर क्यों होती चली जा रही है? जाहिर सी बात है जब कर्मचारी कंपनियों को अपने निजी फायदे के लिए गुलामी लिख देते हैं तो यही हाल होता है. पत्रकारिता का पतन भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है.

अब आप देखिए बिहार में पत्रकारिता कैसी हो रही है? क्या ये सरकार के सामने घुटने नहीं टेक चुकी है? 

कई पत्रकार मित्र बताते हैं कि अख़बारों में सरकार के ख़िलाफ़, यहां तक की ज़िला प्रशासन के ख़िलाफ़ तक की ख़बरें छापने से मना किया जा रहा है. कोफ्त में जब वो अपनी ख़बरें अपने फ़ेसबुक वॉल पर शेयर कर देते हैं तो संस्थान के अधिकारी उन्हें हटाने तक का दबाव डालते हैं.

कल मैंने प्रभात ख़बर के बारे में एक पोस्ट लिखा था जिसमें मैंने बताया था कि कैसे वहां सरकार को खुश करने के लिए सिर्फ़ ख़बरें ही नहीं, विज्ञापन तक दबाए जा रहे हैं, उस पोस्ट पर वहां के एक कर्मी मुझसे भिड़ गए और संस्थान का बचाव करने लगे. जाहिर सी बात है कि उसने यह बचाव अधिकारियों की नज़र में खुद को संस्था के प्रति सबसे ज़्यादा समर्पित दिखाने के लिए किया था ताकि उसे निजी तौर पर पद-प्रोन्नति में फायदा मिल सके.  निजी फायदे की सोच की यही संस्कृति आज बिहार के न्यूज़ रूम को कत्लगाह बना रही है और आपके आसपास बैठने वाले आत्महत्या कर रहे हैं और निकाले जा रहे हैं, पर आपको कोई फर्क नहीं पड़ता. वैसे तो इन न्यूज़ रूम में कई ख़ामियां पहले से हैं, मसलन लिंग भेद, डायवर्सिटी, भाई-भतीजावाद. अब यह संस्कृति इसे नरक बना रही है.

याद रखिए आपकी भी बारी आएगी और उस समय भी आपके साथ कोई खड़ा नहीं होगा. भाई लोग एकजुट होंगे या नहीं, यह तय करने का वक़्त है...

(अभिमन्यु कुमार के फेसबुक वाल से साभार)